National Poetry Writing Month, Day 17: एक मज़दूर की कहानी

तपती धूप में निरंतर पसीना बहाते है,
और उसके बाद मेहनत की खुशियों से रोज़ नहाते है।
पूरी दुनिया से परे इनका अलग कारनामा है,
और परिश्रम के पन्नों पर पसीने की स्याही से इन्होंने लिखा अपना खुद का सफरनामा है।
हीरा जो जलकर भी राख ना हो उसे नूर कहते है,
और वजन कन्धों पर उठाकर भी जो खाक ना हो उसे मज़दूर कहते है। यह वो है जो हर रोज़ आंगारों में अपने बदन जलाते है,
और उसके बदले अपने परिवार के लिए दो वक़्त की रोटी कमाते है।
आमदनी कम है मगर इन्हें किसी बात का गम नहीं,
ईमानदारी पूरी है इसीलिए चौड़ से कहते है “हम मज़दूर भाई भी किसी से कम नहीं।”
काम को धर्म मानना अपने आप में ही एक जीत है,
अरे हारे हुए भ्रष्टाचार के बाद भी अपने मज़दूर भाई हर जगह अजित है।
घर पहुँचते के साथ कौनसी बात से इनका दिल बहल जाता है,
जब अपनी नन्हीं सी गुड़िया को खेलते देखता हैना,
तो थका हारा मज़दूर का पैर भी थोड़ा सा टहल जाता है।
इस काम को सब छोटा मानते है मगर यह किसी से ना डरता है,
अपने परिवार की खुशियों के खातिर यह रोज़ आंगारों से लड़ता है।
आँखों में आंसू लिए एक दिन माँ ने पूछा,
“मेरा लाडला हर रोज़ तू इस आग में क्यों जलता है।”
तो बेटे ने भी दिल थाम कर कहा,
“क्योंकि मेरी कुल्हाड़ी चलने से ही तो हम सबका पेट भरता है।

Written By-Ravish Kumar

Abhishek Mishra

ISTJ, self-proclaimed film connoisseur and critic, history enthusiast. A geek through the day and philosopher by the night. Jack of all trades, trying to be a master of some.

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