National Poetry Writing Month, Day 5: शायद इस दीवाली

शायद इस दीवाली

करूँगा याद मैं वो झिलमिल गलियाँ,
पटाखों का शोर और रौशनी की लड़ियाँ,
रहेगी कसक, लेकिन फर्ज़ से ना मुँह मोड़ पाऊँगा
शायद इस दिवाली मैं घर ना आ पाऊँगा।

ये मीलों फैली वीरान सरहदों की टोलियाँ,
बारूदों का शोर, सायों की आवाज़ें और ये गोलियाँ,
रहो सलामत तुम, वचन ये अपना निभाऊँगा
शायद इस दिवाली मैं घर ना आ पाऊँगा।

देखे दुश्मन देश तरफ़, कतई ना सहन कर पाऊँगा
आने वाली हर मुसीबत को ख़ुशी से झेल जाऊँगा
मिली शाहदत तो लिपट तिरंगें में चला आऊँगा
देश की खातिर हर कदम अपने आप को आज़माऊँगा
पर, शायद इस दिवाली मैं घर ना आ पाऊँगा।
-Written by Nishit Singh Chauhan

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