My Diary, Your Pages

मेरी अर्ज़ियाँ भी सुनती है,मेरी शिकायतें भी सुनती है..

मेरे जज़्बात भी समझती है,मेरी खामोशी भी पढ़ती है..

इस फरेब की दुनियाँ में मेरी डायरी एक हमदर्द का किरदार निभाती है।

कुछ कागज़ अश्क़ों से भरे हुए हैं,तो कुछ पन्ने कोरे पड़े हुए है..

कहीं मिलन की महफ़िल का ज़िक्र है,तो कहीं जुदाई के किस्से लिखे हुए हैं।

पहली किरण के साथ सिलसिला शुरू होता है और चाँदनी रात आ जाती है..

कश्ती मैं लफ़्ज़ों की बनाता हूँ,और वो जज़्बातों में बह जाती है।

कभी कभी वो मुझसे कई सवाल करती है..

ये मेरे आखरी पन्ने पर आखिर तस्वीर किसकी है?

क्या यह वही है जिसके बारे में लिखते लिखते तुम रो जाते हो?

अचानक हस्ते खेलते हुए गुमसुम होजाते हो?

वो बस ऐसे कुछ सवाल करती है जिनका मेरे पास जवाब नहीं रहता..

मगर जब कभी बताता हूँ डायरी को उस तस्वीर की दास्तान..

बस मेरे दर्द-ए-अल्फ़ाज़ों का हिसाब नहीं रहता।

बहुत शरीफ है मेरी डायरी जो दिन रात सिर्फ बातें सुनती रहती है..

मेरे अकेलेपन पर तो मरहम लगा देती है,मगर खुद कुछ ज़ख़्मी रहती है।

-Written by Prakhar Bansal

Prakhar, in his own words:

A Silent sea or a stormy beach, I hold both of them. Its just your way of looking at me.

The illustration of the poem was painted by Deepshikha Arora from the MTTN Art Team.

This is the final poem of the Manipal Poetry Writing Month series. We were overwhelmed by the entries and we had a very difficult time in sifting through and selecting the best poems out of them. Each and every poem was beautiful and exceptionally well-written.

We look forward to hosting many such series and reading what Manipalites have to say.

We sign off from Manipal Poetry Writing Month, presented by MTTN and Type B Poetry. As John Keating (Dead Poets Society) would say,

“Seize the day. Gather ye rosebuds while ye may.”

Reetobaan

Likes to eat rossogollas. Loves the Beatles,Bob Dylan,Wodehouse and cheesy afternoon rom-coms(Don’t Judge).

Lets set off on an adventure with nothing but spare change, a camera and a diary?

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